प्रेरणादायक कहानी दो पत्ते – Motivational Story – 2

प्रेरणादायक कहानी दो पत्ते – Motivational Story – 2

दो पत्ते | Spiritual Guru Osho Stories in Hindi

बहुत समय पहले की बात है गंगा नदी (ganga river) के किनारे पीपल का एक पेड़ (tree) था. पहाड़ों (rock)से उतरती गंगा (ganga) पूरे वेग से बह (flow) रही थी कि अचानक पेड़(tree) से दो पत्ते ( two leaf) नदी में आ गिरे.

एक पत्ता (leaf) आड़ा गिरा और एक सीधा.

जो आड़ा गिरा (down side) वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा(today i will stop this river anyhow)…चाहे मेरी जान (death)ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा(can’t flow the river).”
वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा (shouted) – रुक जा गंगा (stop ganga river) ….अब तू और आगे नहीं बढ़(can’t flow) सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा(i will stop)!

पर नदी (river) तो बढ़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता (leaf) उसे रोकने की कोशिश(trying to stop) कर रहा है. पर पत्ते (leaf) की तो जान पर बन आई थी..वो लगातार संघर्ष (trying) कर रहा था…नहीं जानता था (don’t know ) कि बिना लड़े भी वहीँ पहुंचेगा जहाँ लड़कर..थककर..हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब (now and then) के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा.

वहीँ दूसरा पत्ता (second leaf) जो सीधा गिरा था, वह तो नदी (river) के प्रवाह (flow) के साथ ही बड़े मजे से बहता (float) चला जा रहा था.

“चल गंगा (ganga), आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध (stop) नहीं आने दूंगा….तुझे सागर (sagar) तक पहुंचा ही दूंगा.”

नदी (river) को इस पत्ते (leaf) का भी कुछ पता नहीं…वह तो अपनी ही धुन में सागर (sagar) की ओर बढती जा रही है. पर पत्ता (leaf) तो आनंदित (happy) है, वह तो यही समझ ( leaf is thinking) रहा है कि वही नदी (river) को अपने साथ बहाए ले जा रहा है. आड़े पत्ते (down leaf) की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था (don’t know) कि चाहे वो नदी (river) का साथ दे या नहीं नदी (river) तो वहीं पहुंचेगी जहाँ उसे पहुंचना (destination) है! पर अब और तब के बीच का समय (middle time) उसके सुख का…. उसके आनंद का (happiness moment) काल बन जाएगा.

जो पत्ता नदी (river) से लड़ (fighting) रहा है…उसे रोक रहा है, उसकी जीत (win) का कोई उपाय संभव (possibilities) नहीं है और जो पत्ता नदी को बहाए (floating on river) जा रहा है उसकी हार को कोई उपाय संभव नहीं है.

ओशो कहते हैं–

व्यक्ति ब्रह्म की इच्छा के अतिरिक्त कुछ कभी कर नहीं पाता है, लेकिन लड़ सकता है, इतनी स्वतंत्रता है। और लड़कर अपने को चिंतित कर सकता है, इतनी स्वतंत्रता है…इतना फ्रीडम है।

इस फ्रीडम (Freedom) का प्रयोग आप सर्वशक्तिमान (shaktiman) की इच्छा से लड़ने में कर सकते हैं और तब जीवन (life) उस आड़े पत्ते के जीवन की तरह दुःख (sadness)और संताप के अलावा और कुछ नहीं होगा…या फिर आप उस फ्रीडम (freedom) को ईश्वर (god) के प्रति समर्पण बना सकते हैं और सीधे पत्ते की तरह आनंद विभोर हो सकते हैं.

 

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